Meta Description: हैदराबाद के विश्वप्रसिद्ध खैराताबाद गणेश जी का विसर्जन हुसैन सागर झील में भव्यता के साथ संपन्न हुआ। 1954 से शुरू हुए इतिहास, क्रेन नंबर-6 के कमाल और 30 हजार पुलिसकर्मियों की अभेद्य सुरक्षा पर पढ़ें पूरी विस्तृत रिपोर्ट। हैदराबाद में आस्था का महासंगम: हुसैन सागर में बाप्पा की ऐतिहासिक विदाई तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में गणेशोत्सव का समापन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनसैलाब और अद्वितीय परंपराओं का महासंगम बन जाता है। यूं तो पूरे शहर में हजारों छोटी-बड़ी प्रतिमाओं का विसर्जन होता है, लेकिन पूरी दुनिया की नजरें केवल ‘खैराताबाद बड़ा गणेश’ (Khairatabad Bada Ganesh) पर टिकी रहती हैं। इस वर्ष 69 फीट ऊंची विशालकाय ‘पंचमुख संकटा हरा महा गणपति’ प्रतिमा की शोभायात्रा और विसर्जन को देखने के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। दोपहर में ठीक 2:25 बजे क्रेन नंबर-6 (Crane No. 6) और विशेष रूप से तैयार किए गए ‘फ्लोटिंग बार्ज’ (Floating Barge) के माध्यम से बाप्पा को एनटीआर मार्ग पर हुसैन सागर के पवित्र जल में मंत्रोच्चार के साथ विसर्जित किया गया। विसर्जन संपन्न होते ही पूरा टैंक बंड क्षेत्र ‘गणपति बाप्पा मोरया’ और गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। 1954 से 2026 तक: 1 फुट से भारत की सबसे ऊंची प्रतिमा बनने का सफर खैराताबाद गणेश का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक एकजुटता की एक अनूठी मिसाल है: 1954 में पहली स्थापना: स्वतंत्रता सेनानी सिंगरी शंकरैया मुदिराज (Singari Shankaraiah Mudiraj) ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रेरित होकर 1954 में खैराताबाद में मात्र 1 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा स्थापित कर इस पावन परंपरा की शुरुआत की थी। हर साल 1 फीट ऊंचाई की परंपरा: श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास को देखते हुए समिति ने हर साल प्रतिमा की ऊंचाई 1-1 फुट बढ़ाने का ऐतिहासिक फैसला किया, जिसके बाद यह देश की सबसे भव्य प्रतिमाओं में शुमार हो गई। पर्यावरण-अनुकूल क्ले गणेश: हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए समिति ने प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) को छोड़कर पूरी तरह से प्राकृतिक मिट्टी (Clay Ganesh) और वाटर-बेस्ड रंगों से विशाल मूर्तियां बनाना शुरू किया, ताकि हुसैन सागर झील के जलीय जीवन को कोई नुकसान न पहुंचे। क्रेन नंबर-6 और इंजीनियरिंग का अद्भुत प्रदर्शन कई टन वजनी और लगभग 7 मंजिला इमारत जितनी ऊंची प्रतिमा को पंडाल से हुसैन सागर झील तक सुरक्षित पहुंचाना और पानी में उतारना एक बेहद जटिल इंजीनियरिंग चुनौती होती है: विशालकाय ट्रेलर्स: प्रतिमा को बेहद धीमी और नियंत्रित गति से विशेष ट्रेलरों पर रखकर हुसैन सागर तट तक लाया गया। क्रेन नंबर-6 की मुख्य भूमिका: हुसैन सागर तट पर स्थित क्रेन नंबर 6 सबसे शक्तिशाली हाइड्रोलिक क्रेन है, जो बाप्पा के विशाल वजन को आसानी से संतुलित करते हुए फ्लोटिंग बार्ज पर स्थापित करती है। सैकड़ों किलो का महाप्रसाद: बाप्पा के हाथों में रखा जाने वाला प्रसिद्ध तपेस्वरम लड्डू (Tapeswaram Laddu) भी इस उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण रहा, जिसे देखने देश भर से श्रद्धालु पहुंचे थे। 30,000 सुरक्षाबल, ड्रोन और हेलीकॉप्टर से अभेद्य सुरक्षा लाखों की भीड़ और वीआईपी मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए तेलंगाना सरकार और हैदराबाद पुलिस कमिश्नरेट ने सुरक्षा का कड़ा खाका तैयार किया था: त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा: विसर्जन मार्ग पर 30,000 से अधिक पुलिसकर्मियों, रैपिड एक्शन फॉर (RAF) और आपदा प्रबंधन (HYDRAA) के कुशल गोताखोरों की टीमें तैनात रहीं। हवाई और डिजिटल निगरानी: पूरे शहर और विसर्जन मार्ग पर 40 से अधिक हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरों और लाइव ड्रोन कैमरों से लगातार मॉनिटरिंग की गई। उच्च अधिकारियों ने हेलीकॉप्टर से पूरी शोभायात्रा का हवाई सर्वेक्षण भी किया। ट्रैफिक डायवर्जन: आम जनता की सुविधा के लिए पहले ही एडवाइजरी जारी कर कई मुख्य मार्गों पर भारी वाहनों का प्रवेश पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था। संस्कृति और सौहार्द का प्रतीक देश के अलग-अलग राज्यों से आए 150 से अधिक कुशल कारीगरों ने महीनों की मेहनत के बाद इस प्रतिमा को भव्य रूप दिया था। विसर्जन के इस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए न केवल तेलंगाना, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी लाखों पर्यटक पहुंचे थे। इस सफल और शांतिपूर्ण आयोजन ने एक बार फिर हैदराबाद की सांस्कृतिक विरासत और सर्वधर्म समभाव को साबित किया है। Post navigation मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर उठे गंभीर सवाल: आखिर क्या है ECINet और SIR की असली सच्चाई जिसने हलचल मचा दी?